बॉलीवुड में तो 'दिल्ली की सर्दी' के बारे गाना लिखा गया. मगर, हक़ीक़त ये है कि दिल्ली में गर्मी का सीज़न बहुत
मुश्किल भरा हो सकता है. गर्मियों में दिल्ली का तापमान कई बार 47-48
डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है.
ब्रिटिश नागरिक डीन नेल्सन हाल ही
में दिल्ली में रहने आए हैं. उन्होंने दिल्ली के निज़ामुद्दीन वेस्ट
इलाक़े में अपना आशियाना बनाया है. वो अपने घर के लिए एसी सिस्टम की तलाश
कर रहे थे. इसके लिए वो एक दिन अंग्रेज़ी अख़बार 'द हिंदू' के पन्ने पलट
रहे थे. तभी, नेल्सन को एक विज्ञापन दिखाई दिया. ये विज्ञापन 'स्नोब्रीज़' नाम की मशीन के बारे में था, जो बर्फ़ से ठंडा करती थी. इस मशीन को रिटायर्ड पत्रकार ने बनाया था, ताकि ग्रामीण लोगों को मदद कर सकें. नेल्सन इस मशीन के बारे में जानकर हैरान थे. ये किसी आम एयरकंडीशनर से बहुत सस्ता था.
डीन नेल्सन ने इसे आज़माने की ठानी. उन्होंने एक स्नोब्रीज़ मशीन का ऑर्डर दे दिया. इसे लगाने के लिए किसी बढ़ई या इलेक्ट्रीशियन की ज़रूरत थी. जब स्नोब्रीज़ नेल्सन के घर पहुंची तो उनकी हैरानी और भी बढ़ गई. ये मशीन एक नीले रंग के बड़े से डस्टबिन जैसी दिख रही थी.
इसका मुंह स्केटबोर्ड जैसा दिख रहा था. नेल्सन कहते हैं कि इस मशीन ने उन्हें फ़ौरन जुगाड़ शब्द की याद दिला दी, जो बिल्कुल देसी और विशुद्ध भारतीय है, जो बहुत सी मुश्किलों का हल ढूंढ लेता है.
आप भारत के गांवों की तरफ़ निकल जाएं, तो क़दम-क़दम पर जुगाड़ की मिसालें दिख जाएंगे. कबाड़ जैसे ट्रक की मदद से पूरे गांव को बिजली की सप्लाई होती दिखेगी.
कोट के हैंगर से बने टीवी के एंटीना दिखेंगे. गांवों में अक्सर चटख रंगों वाली तिपहिया गाड़ियां दिख जाती हैं, जो एक शोर मचाने वाले वाटर पम्प की मोटर और कुछ कल-पुर्ज़ों को जोड़कर बनाए गए इंजन से चलती हैं.
कुल मिलाकर जुगाड़ हिंदुस्तान का मिज़ाज है. हर मुश्किल का तोड़ ढूंढ लेने का जज़्बा. तभी तो मुंबई के डब्बावाले मुश्किल बैलेंस बनाकर गाड़ियों में सैकड़ों डब्बे लाद कर रोज़ाना शहर की भीड़ भरी सड़कों से गुज़रते हैं.
सही जगह और सही वक़्त पर शहर के दो लाख लोगों को गर्मा-गर्म खाना पहुंचाते हैं. मुंबई के डब्बावालों की मुस्तैदी का आलम ये है कि एक करोड़ साठ लाख में शायद किसी एक डब्बे को पहुंचाने में ग़लती हो. वो इतने भरोसेमंद हैं कि दुनिया की बड़ी कूरियर कंपनी फेडेक्स ने डब्बावालों से सटीक डिलिवरी के राज़ को समझने की कोशिश की.
हाल के दिनों में कार्पोरेट दुनिया में भी जुगाड़ शब्द बहुत लोकप्रिय हो रहा है. मैनेजमेंट गुरू पश्चिमी देश के कारोबारियों को सलाह दे रहे है कि वो भी जुगाड़ सीखें.
मुश्किल वक़्त में कम संसाधनों में काम चलाने का हुनर सीखें. युवा भारतीयों को अपने देश के जुगाड़ पर गर्व होने लगा है. वो ट्विटर पर # हैशटैग के ज़रिए अपने देश की इस ख़ूबी को सलाम कर रहे हैं.
इस हैशटैग के ज़रिए वो भारत में प्रचलित तमाम जुगाड़ों की तस्वीरें साझा कर रहे हैं. जैसे कि लैपटॉप की स्क्रीन का आईने की तरह इस्तेमाल करते हुए शेविंग करना. या फिर, लोहे पर मांस को बारबेक्यू करना. ऐसी तस्वीरें ख़ूब वायरल हो रही हैं.
चेन्नई के रहने वाले आंत्रेप्रेन्योर कन्नन लक्ष्मीनारायणन कहते हैं कि तमाम मुश्किलों का फौरी हल निकालना भारतीयों की परंपरा रही है. अगर आप गांवों में रहते हैं तो अक्सर आप का सामना बिजली कटौती से होगा. बहुत से गांवों में लोग ज़रूरत पड़ने पर ट्रैक्टर या गाड़ी चलाकर रोशनी कर लेते हैं.
लक्ष्मीनारायणन की कंपनी वोर्टेक्स इंजीनिरिंग प्राइवेट लिमिटेड ने ग्रामाटेलर नाम से एटीएम मशीन बनाई है.
ये मशीन 70 वाट के बल्ब के बराबर बिजली में चल जाती है. बहुत कम पैसे से तैयार की गई इस एटीएम मशीन को अनपढ़ लोग भी चला सकते हैं. उनकी पहचान इस मशीन में लगे फिंगरप्रिंट स्कैनर से हो जाती है. बिजली न होने पर ग्रामाटेलर बैटरी से चल जाती है.
ग्रामाटेलर किसी एटीएम मशीन के मुक़ाबले एक चौथाई क़ीमत में ही आ जाती है. ग्रामीण इलाक़ों के लिए ये मशीन वरदान बन गई है. क्योंकि देश के कई गांव ऐसे हैं, जहां से एटीएम मशीनें बहुत दूर होती हैं.
भारत जैसे देश में जहां, विश्व बैंक के मुताबिक़ करोड़ से ज़्यादा लोग ग़रीबी रेखा के नीचे रहते हैं, वहां जुगाड़ बहुत काम की चीज़ है. बहुत सी ज़रूरतें, छोटे-मोटे फौरी नुस्खों से पूरी कर ली जाती हैं. ये हिंदुस्तानियों की शानदार क्रिएटिविटी की मिसाल है.
भारत के जुगाड़ पर डीन नेल्सन ने 'जुगाड़ यात्रा: एक्सप्लोरिंग द इंडियन आर्ट ऑफ़ प्रॉब्लम सॉल्विंग' से किताब लिख डाली है. नेल्सन कहते हैं कि, 'जब आप मुश्किल हालात को भारतीयों के समस्या के समाधान तलाशने के हुनर से जोड़ते हैं, तो नतीजा होता है जुगाड़. समस्याओं का ऐसा निदान, जो दुनिया में कहीं और नहीं देखने को मिलता.'
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